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अश्वगंधा Ashwagandha(Withania Somnnifera) के गुण और महत्वपूर्ण फायदे

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अश्वगंधा Ashwagandha

इसे अन्य भाषाओं में असगंध, धोड़ा कुन, पत्थरफूल आदि नामो से जाना जाता है। यह लगभग भारत के सभी जगहों पर पाया जाता है। इसका पौधा वर्षा ऋतु में उगता है। इसका पौधा 2 से 3 फ़ीट तक ऊँचे होते है और इसकी रिगणी की तरह कई शाखाये निकलती है। इस पौधे में लाल रंग के फल लगते है, जो बरसात के अंत में या जाड़े के प्रारम्भ में दिखाई देते है। इसकी जड़ एक फ़ीट लम्बी, मजबूत, चेपदार और स्वाद में कड़वी होती है।

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अश्वगंधा के आयुर्वेदिक गुण

यह एक नशीली और वित्त तत्व से युक्त वनस्पति होती है। इसके फल के विष का प्रभाव बेलाडोना के विष के समान होता है। इसके बीज को दूध में डालने से दूध जम जाता है। बाजार में मौजूद असगंध की जड़े दूसरी असगंध रहती है। उसमे नशीला और जहरीला प्रभाव बिलकुल नहीं होता है।
इसकी जड़ पौष्टिक, धातु परिवर्तक और कामोद्दीपक होता है। ये क्षय रोग, बुढ़ापा, दुर्बलता तथा गठिया के रोग में लाभदायक होता है। इसमें निद्रा लाने वाले और मूत्र बढ़ाने वाले पदार्थ भरपूर मात्रा में पाए जाते है।

असगंध के फायदे या उपयोग

  • अश्वगंधा कामोत्तेजना बढ़ाने और नपुंसकता को ख़त्म करने का बहुत ही कारगर उपाय है। आयुर्वेद में कामोत्तेजना का कोई और नहीं बल्कि अश्वगंधा ही रामबाण इलाज है। इसके चूर्ण को पानी या दूध के साथ लेने से पौरुष शक्ति बढाती है और बढ़ती उम्र में भी व्यक्ति को जवान बनायीं रखती है। इसका कम से कम एक महीने तक सेवन करने से वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या बढ़ा कर नपुंसकता खत्म करती है।
  • इसके सेवन करने से मधुमेह में बहुत लाभ मिलता है। ये ब्लड शुगर लेवल को कम करके नियंत्रित रखता है और साथ ही कोलेस्ट्रॉल स्तर में भी कमी लाता है।
  • असगंध का चूर्ण प्रतिदिन पानी या दूध के साथ लेने से गठिया रोग में बहुत आराम मिलता है।
  • दो ग्राम असगंध के चूर्ण, एक ग्राम सोंठ और तीन ग्राम मिश्री लेकर अच्छी तरह से पीसकर मिला ले खाने के बाद इसको गर्म पानी के साथ लेने से वात सम्बंधित रोग, पेट में गैस जलन आदि समाप्त करता है।
  • असगंध, मुलहठी और आवंला को सामान मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना ले इसे प्रतिदिन एक चम्मच लेने से आँखों के रौशनी में वृद्धि होती है।
  • अश्वगंधा के जड़ो को पीसकर शुद्ध पानी के साथ पेस्ट बना ले इसे घाव पर लगाने से घाव जल्दी भर जाते है और दर्द में आराम मिलता है।
  • इसके चूर्ण को प्रतदिन सुबह शाम दो-दो चम्मच दूध के साथ लेने से रुके हुए बच्चो की लम्बाई बढ़ने लगती है।
  • इसकी ताजी जड़ को चन्दन की तरह घिसकर गांठ, फोड़ा आदि पर लगाने से बहुत आराम मिलता है।
  • सफ़ेद मूसली के साथ असगंध का चूर्ण दूध के साथ लेने से बल में वृद्धि होती है और कमजोरी दूर होती है।

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2 Comments

    • बारिश के महीने के अंतिम दिनों में इसे बोया जाता है। फसल के विकास के लिए शुष्क मौसम अच्छा रहता है। जिन स्थान में वर्षा 660-750 मिमी की होती है वे स्थान फसल के विकास के लिए उपयुक्त होते है। वार्षिक वर्षा 600 से 750 मिलीलीटर में अश्वगंधा की वृद्वि अच्छी से होती है बीच में 1-2 बार ठण्ड में बर्षा होने से अश्वगंधा की जड़ो की पूर्ण विकास होता है।
      अगस्त और सितम्बर माह में जब वर्षा हो जाऐ उसके बाद जुताई करनी चाहिये। दो बार कल्टीवेटर से जुताई करने के बाद पाटा लगा देना चाहिये। 10-12 कि0ग्रा0 बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है। अच्छी पैदावार के लिये पौधे से पौधे की दूरी 5 सेमी0 तथा लाइन से लाइन की दूरी 20 सेमी0 रखना चाहिये।अश्वगंधा की पौधा जुलाई-सितम्बर में फूल आता ह और नवम्बर-दिसम्बर में फल लगता है।
      जब पौधा उम्र 6 दिनो का होतो उसे रोपण किया जाता है तथा दूरी कतार की कतार 60 सेन्टीमीटर होनी चाहिए। अश्वगंधा की फसल को खाद एवं उर्वरक अधिक आवश्यकता नहीं रहती है। पिछले फसल के अवशेष उर्वरकता से खेती किया जाता है।इसके लिए सिर्फ गोबर की सड़ी खाद पर्याप्त होती है।
      अश्वगंधा की कटाई जनवरी से मार्च तक लगातार चलता रहता है। अश्वगंधा पौधे को उखड़ा जाता है उसे जड़ों को पौधे के भागों को काटकर अलग किया जाता है और जड़ों को 7 से 10 सेन्टीमीटर लंबाई तक काटकर छोटे-छोटे टुकड़े किये जाते है जिससे आसानी से उसे सुखाया जा सके। पौधे के पके फल से बीज एवं सुखे पतियॉ प्राप्त किया जाता हैं।
      अश्वगंधा का अगर बाजार देखा जाये तो आप उत्पादन करके इसे आयुर्वेदिक फार्मा कंपनी को भेज सकते है। जहा आप को बाजार के अनुसार रेट मिलते है।

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